माँ कालिका देवी, पीले वस्त्र, बसंत पंचमी, और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
माँ कालिका देवी, पीले वस्त्र, बसंत पंचमी, और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
12वीं–13वीं शताब्दी में जब हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया दिल्ली में सूफ़ी सिलसिले के प्रमुख संत थे, उस समय उनके भतीजे ख़्वाजा ताक़ीउद्दीन नूह का बीमारी से निधन हो गया। इस दुख से औलिया महीनों तक शोकाकुल रहे और मुस्कुराना तक छोड़ दिया।
अपने गुरु की यह अवस्था देखकर अमीर ख़ुसरो अत्यंत व्याकुल हो उठे। एक दिन वे यमुना नदी के पार महिलाओं का एक समूह देख रहे थे, जो बसंत पंचमी के अवसर पर पीले वस्त्र पहनकर, सरसों के फूल चढ़ाकर, गीत और नृत्य के माध्यम से कालीका देवी मंदिर में पूजा कर रही थीं।
ख़ुसरो ने उनसे पूछा कि वे पीले वस्त्र और सरसों के फूल क्यों अर्पित कर रही हैं। महिलाओं ने बताया कि यह उनकी देवी को प्रसन्न करने का पारंपरिक तरीका है। यह जानकर ख़ुसरो के मन में विचार आया कि क्यों न इस उल्लास को अपने गुरु के दुख को कम करने के लिए उपयोग किया जाए।
बसंत पंचमी की दरगाह पर शुरुआत
अगले दिन अमीर ख़ुसरो ने स्वयं पीले कपड़े पहने, बालों में पीले फूल लगाए और ढोलकी लेकर बसंती गीत गाते हुए अपने गुरु के सामने पहुँचे। उन्होंने प्रसिद्ध कलाम “सकल बन फूले सरसों...” प्रस्तुत किया। यह देखकर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया महीनों बाद पहली बार मुस्कुराए।
यही क्षण दरगाह पर बसंत उत्सव की परंपरा की शुरुआत माना जाता है।
आज की परंपरा
तब से लेकर आज तक, हर वर्ष बसंत पंचमी के दिन हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर यह उत्सव मनाया जाता है। अनुयायी पीले वस्त्र धारण करते हैं, पीली चादर और सरसों के फूल दरगाह पर चढ़ाते हैं और अमीर ख़ुसरो के कलाम गाए जाते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि यह उत्सव केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं रहा। पूर्व-भारत विभाजन काल से उत्तर भारत में बसंत पंचमी एक साझा सांस्कृतिक पर्व रहा है, जिसे हिंदू, सिख और मुसलमान सभी समुदाय वसंत ऋतु के स्वागत के रूप में मनाते रहे हैं।
ऐतिहासिक महत्व
- हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (1238–1325 ई.): भारत में सूफ़ी चिश्ती सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध संत।
- हज़रत अमीर ख़ुसरो (1253–1325 ई.): “तोता-ए-हिंद” (भारत का तोता) कहे जाने वाले कवि, संगीतकार और सूफ़ी संत।
- ख़ुसरो द्वारा रचित बसंती कलाम “सकल बन फूले सरसों” आज भी इस अवसर पर गाया जाता है।
निष्कर्ष
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